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जब पत्रकारिता सेवा बनी और सेवा को संत का आशीर्वाद मिला

गोविंद देव गिरी जी महाराज के हाथों शांतनु शुक्ल का सम्मान—सनातन और संत समाज के बीच संवाद की एक भावनात्मक कहानी

हर पत्रकार की अपनी एक यात्रा होती है। कुछ यात्राएं खबरों से बनती हैं, कुछ रिश्तों से और कुछ ऐसी होती हैं, जो धीरे-धीरे सेवा का रूप ले लेती हैं।

वरिष्ठ पत्रकार एवं आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज के अंतरराष्ट्रीय मीडिया प्रभारी शांतनु शुक्ल की यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही है—जहां पत्रकारिता की कलम धीरे-धीरे सनातन, संत परंपरा और आध्यात्मिक चेतना की आवाज को समाज तक पहुंचाने का माध्यम बन गई।

कृष्ण जन्मभूमि न्यास की बैठक के उपरांत आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव एवं श्रीकृष्ण जन्मभूमि न्यास के उपाध्यक्ष परम पूज्य गोविंद देव गिरी जी महाराज ने शांतनु शुक्ल को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।

यह केवल एक औपचारिक सम्मान नहीं था।

गोविंद देव गिरी जी महाराज ने उनके सनातन धर्म और संत समाज के प्रति समर्पण की सराहना करते हुए कहा

“आज आपके कारण पत्रकार वर्ग भी सनातन के साथ जुड़ रहा है और साधु-संतों के साथ जुड़ रहा है।”

संत के मुख से निकले ये शब्द उस व्यक्ति के लिए शायद सबसे बड़ा पुरस्कार थे, जिसने वर्षों से अपने शब्दों और संपर्कों के माध्यम से संतों की वाणी को मीडिया और समाज तक पहुंचाने का प्रयास किया है।

संतों और मीडिया के बीच एक सेतु

शांतनु शुक्ल के लिए पत्रकारिता सिर्फ खबर लिखने या खबर पहुंचाने का माध्यम नहीं रही। संत समाज के साथ उनका जुड़ाव उन्हें उस भूमिका तक ले गया, जहां वे संतों और मीडिया के बीच संवाद का एक सेतु बनते गए।

आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज के अंतरराष्ट्रीय मीडिया प्रभारी के रूप में उन्होंने धार्मिक आयोजनों, संतों के संदेश और सनातन से जुड़े विषयों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाई।

उनकी कोशिश रही कि संतों की बात केवल आश्रमों और मंदिरों तक सीमित न रहे, बल्कि समाचार कक्षों से निकलकर देश-दुनिया के करोड़ों लोगों तक पहुंचे।

गोविंद देव गिरी जी महाराज का सम्मान इसी प्रयास की सार्वजनिक स्वीकृति जैसा था।

एक ही मंच पर दो पीढ़ियों का विश्वास

इसी कार्यक्रम में ‘हनुमान अंश’ फिल्म की निर्माता अनुप्रिया नागर को भी गोविंद देव गिरी जी महाराज ने “देश की बेटी” कहकर सम्मानित किया।

अनुप्रिया नागर ने भी इस अवसर पर शांतनु शुक्ल के योगदान को याद करते हुए फिल्म के निर्माण और उसके संदेश को आगे बढ़ाने में उनके सहयोग की सराहना की।

यह दृश्य इसलिए भी खास था क्योंकि एक तरफ संत परंपरा के वरिष्ठ संत का आशीर्वाद था और दूसरी ओर नई पीढ़ी की एक फिल्म निर्माता का विश्वास।

दोनों के बीच कहीं शांतनु शुक्ल की वह भूमिका दिखाई दे रही थी, जिसमें सनातन की परंपरा और आधुनिक मीडिया की दुनिया के बीच संवाद कायम करने का प्रयास लगातार जारी है।

शॉल का सम्मान, वर्षों के समर्पण की पहचान

कंधों पर डाली गई शॉल कुछ क्षणों का दृश्य थी, लेकिन उसके पीछे वर्षों का विश्वास, रिश्ते और समर्पण खड़ा था।


संत के हाथों मिला सम्मान किसी भी पत्रकार के लिए इसलिए विशेष होता है क्योंकि पत्रकारिता का सबसे बड़ा पुरस्कार केवल प्रसिद्धि नहीं, बल्कि यह विश्वास है कि आपकी कलम किसी बड़े उद्देश्य की सेवा कर रही है।

गोविंद देव गिरी जी महाराज का आशीर्वाद शांतनु शुक्ल के लिए उसी विश्वास की तरह था।

यह कहानी केवल एक सम्मान की नहीं है।

यह उस विचार की कहानी है जिसमें पत्रकारिता खबर से आगे बढ़कर संस्कृति की सेवा बन जाती है, शब्द साधना बन जाते हैं और मीडिया सनातन की आवाज को समाज तक पहुंचाने का माध्यम।

और शायद यही इस सम्मान की सबसे खूबसूरत बात थी—

संत ने केवल शॉल नहीं ओढ़ाई, बल्कि वर्षों के समर्पण को अपना आशीर्वाद दिया।

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